Writer & Affiliation · लेखक परिचय
दीपक नेगी
Corresponding writer विद्यालयी शिक्षा विभाग, उत्तराखंड
Published Work · प्रकाशित रचना
तुम्हारे शून्य से बड़ा हूँ मैं
और शून्य में ही खड़ा हूँ मैं
ध्यान में जिसको साधते हो तुम
स्वप्न में जिसके जागते हो तुम
उस मनश्व: से लड़ा हूँ मैं
चेतना बिंदु से बड़ा हूँ मैं
तुम्हारी ज्ञान दृष्टि के छोर में
अनुकल्पित एक कल्प भोर में
अस्तित्व के प्रश्नों के शोर में
उत्तर ले ध्रुव अडिग खड़ा हूँ मैं
तुम्हारी प्रेक्षा में ही प्लवित
चेतना बिंदु से बड़ा हूँ मैं
मूक अंतर्नाद की अनुगूँज हूँ मैं
गुंजित भ्रमरगीत का हेमंत हूँ मैं
सुर नर असुर सब ही तो हूँ मैं
कालकूट पीयूष मंथन में पड़ा हूँ मैं
तुम्हारे शून्य से बड़ा हूँ मैं
और शून्य में ही खड़ा हूँ मैं
Writer & Affiliation · लेखक परिचय
Published Work · प्रकाशित रचना
मेरी आत्मा का आवरण शरद है
निष्ठुर ये शीत पे ही मोहित है
सूर्य का तेज या प्रेम प्रकाश
कोई तपिश नही इसे विदित है
मनस कानन में फैला तुषार
आत्मीय आलिंगन कर चुका है
विरह से विरक्ति जनित उपचार
मोह के बंधन खोल चुका है
ऋतु है रंगों की और मैं एक वर्णी
वर्ण प्रेम के और मैं कथित अधर्मी
अब सप्त वर्ण प्रसून और बसन्त
कर न सके कुछ भी जीवन्त
लिए शैवाल का मखमली साथ
तमस, नम और निर्जन मन
कवक कुकरमुत्तों की छत्रछाया
विपरीत है मन का बसन्त
अनायास कुछ भी नही घटित है
पीड़ा सागर में वो साथ प्लवित है
मैं कहता हूं इसीलिए,
कि,
ऋतुराज मेरे लिए नही है
इसकी सिहरन और गर्जन
देह भित्ति में अनुपस्थित रही है
स्नेह उपेक्षा से कुंठित जीवन भर
प्राण गिरवी रख चुका में उन पर
और बसन्त,
बसन्त की अल्पना धरा पर
जैसे है सजी शैय्या मेरे शव पर ।