Poetry
एक शोकगीत: वसंत के लिए
Writer & Affiliation · लेखक परिचय
Published Work · प्रकाशित रचना
मेरी आत्मा का आवरण शरद है
निष्ठुर ये शीत पे ही मोहित है
सूर्य का तेज या प्रेम प्रकाश
कोई तपिश नही इसे विदित है
मनस कानन में फैला तुषार
आत्मीय आलिंगन कर चुका है
विरह से विरक्ति जनित उपचार
मोह के बंधन खोल चुका है
ऋतु है रंगों की और मैं एक वर्णी
वर्ण प्रेम के और मैं कथित अधर्मी
अब सप्त वर्ण प्रसून और बसन्त
कर न सके कुछ भी जीवन्त
लिए शैवाल का मखमली साथ
तमस, नम और निर्जन मन
कवक कुकरमुत्तों की छत्रछाया
विपरीत है मन का बसन्त
अनायास कुछ भी नही घटित है
पीड़ा सागर में वो साथ प्लवित है
मैं कहता हूं इसीलिए,
कि,
ऋतुराज मेरे लिए नही है
इसकी सिहरन और गर्जन
देह भित्ति में अनुपस्थित रही है
स्नेह उपेक्षा से कुंठित जीवन भर
प्राण गिरवी रख चुका में उन पर
और बसन्त,
बसन्त की अल्पना धरा पर
जैसे है सजी शैय्या मेरे शव पर ।