Poetry
पीतल और सोना
Writer & Affiliation · लेखक परिचय
Published Work · प्रकाशित रचना
चैन से थोड़ा रह सकूँ
दुनिया की बातें सह सकूँ
पूछे जब कोई नाम मेरा
सर उठा के कह सकूँ
बस इतना सा पाने को
खुद को ही फुसलाने को
मीलों दूर मैं दौड़ आया
सब कुछ अपना छोड़ आया
छूट गए सब साथी संगी
छूट गई पतली पगडण्डी
अब कहाँ वो घर का ठाठ
भूल गए हम छठ का घाट
ये कहाँ पहुँच गए चलते-चलते
धुएँ से आँखें मलते-मलते
चैन किसी को यहाँ कहाँ है
पाँव हैं भागे, राह धुआँ है
अब मैं वीरानों में रहता हूँ
जो भी सब बोले सहता हूँ
कुछ भी कहने से डरता हूँ
खुद से ही बातें करता हूँ
किस से पूछूँ मेरा गाँव कहाँ है
पीपल की वो छाँह कहाँ है
यहाँ तो सब-के-सब भाग रहे हैं
रातों में भी जाग रहे हैं
यही पाने क्या निकला था
क्या सोच रहा जब फिसला था
झोली में भरने पीतल थोड़ा
मैंने हाथों से सोना छोड़ा