Poetry
दिनचर्या
Writer & Affiliation · लेखक परिचय
Published Work · प्रकाशित रचना
सिंक में पड़े बर्तनों का ढेर,
उनकी खड़खड़ाहट के बीच
दूर बिल्ली की म्याऊँ सुनाई देती है।
यहाँ कितना भोजन बना है,
वहाँ अभी शिकार की तैयारी है।
तभी फ्रिज का ख्याल आता है,
दरवाज़ा खोलती हूँ
कुछ ढूँढते-ढूँढते
दृष्टि जाती है एक पैकेट पर।
एक्सपायरी डेट देखकर
हटा देती हूँ।
अचानक कुत्तों का शोर बढ़ता है।
चौखट किनारे
बचे-खुचे भोजन में मुँह लगाए
आपस में लड़ रहे हैं।
इन सब से उकताकर
मैं छत पर कपड़े सुखाने जाती हूँ।
वहाँ भरी रस्सियाँ
मुँह चिढ़ाती हैं।
इनमें जगह बनाते हुए
एक मद्धिम-सी आवाज़ घुलती है।
सामने की खिड़की में
दो परछाइयाँ दिखती हैं
छोटी परछाईं
हठ से पाँव पटकती है
“मुझे नई जींस
कब दिलाओगे?”
मैं कुछ क्षण ठहरती हूँ।
फिर वापस आकर
अखबार की सुर्खियाँ देखती हूँ
और सो जाती हूँ।