Poetry
Creative Writer · रचनाकार
सचिन बिजनौरी
असिस्टेंट मैनेजर (Assistant Manager) किया इंडिया (Kia India) गुरुग्राम, हरियाणा, भारत
तुम दो लफ्ज कहते हो
और वो लफ़्ज सुनाना चाहती है
तुम किसी का आसरा मांगते हो
और वो बिन सहारे चलना चाहती है
तुम भरी आँखों से ख्बाब देखते हो
और वो उन्हे सच करना चाहती है
तुम समय को तकते हो
और वो समय मे ढलना चाहती है
तुम ता उम्र आराम चाहते हो
अोर वो थक कर सोना चाहती है
तुम खुद को अकेला रखना चाहते हो
और वो तुमको खुद मे बुनना चाहती है
तुम किसी पल हताश होते हो फिर भी
वो सदा मुस्कुराए रहना चाहती है
और खिलखिलाना चाहती है।
जीना चाहती है ! पल पल सभी को हँसाना चाहती है
More creative works by सचिन बिजनौरी · अन्य रचनाएँ
Poetry
वो धारा थी बह गई
Volume 1
Issue 1
September 2025 pp. 60
Writer & Affiliation · लेखक परिचय
सचिन बिजनौरी
Corresponding writer
असिस्टेंट मैनेजर (Assistant Manager) किया इंडिया (Kia India) गुरुग्राम, हरियाणा, भारत
Published Work · प्रकाशित रचना
वो धारा थी बह गई
अपने को खुद मे समेटे हुए
वो बस पिघलकर रह गई
वो धारा थी बह गई
मजधारो को बीच मे लिए
कोई कश्ती जैसे गुम खड़ी थी
तीर से जैसे सब कह गई
वो धारा थी बह गई
असमजंस मे थी थोडी व्याकुल
वो नीर भरकर नीर को ही निर्लज कह गयी
वो धारा थी बह गई
बनाकर रास्ते जहाँ पहुची
लगा अब वो मजिल को पा चली
हो गया विलय पतन का
सागर मे सिमट कर रह गई
वो धारा थी बह गई ।
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