Poetry
Creative Writer · रचनाकार
यशवंत पंवार
सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, राजकीय महाविद्यालय, चिन्यालीसौड़, उत्तरकाशी, उत्तराखंड, (भारत)
उषा की आभा, कुछ ऐसी, प्रकट हो रही है,
न शीतलता, न अपना आवरण, दिखा पा रही है।
उदयाचल भी शिथिल छटा में, गुम दिख रहा है,
दिन बढ़ता भी मानसून को, आज अखर रहा है।
विहार कर रहे, अवनि के, जीवन्त कुछ ऐसे,
ज्यूं अपने सदन में, उन्हें, कोई बहुत सता रहा है।
घर से बाहर निकलने को हैं लोग आतुर बहुत,
अबका मानसून सबको, ऐसा सता रहा है ।
गाड़ गढ़ने ऊफान पर, बोल रहे कुछ ऐसे,
ज्यूं झूण्ड से बिछड़ा नाग चिंगाड़ रहा हो ।
पास ही सड़कें धरती के उदर में समा गई हैं,
वर्षा मानसून की, कहर, कुछ ऐसा ढा रही है।
सिलसिला है, बादल फटने का इसकदर जारी
उत्तर कभी,कभी दखिन से, सूचना रोज आ रही।
धार बारिश की, दिनोंदिन न रुका रही है।
अबके मानसून में, हृदय कालि सुख रही है।
निशा ने ओढ़ी श्यामल ओढ़नी को
कड़कती बिजली हिला रही है।
गगन के सितोर यूं सिमटे रह गये हो,
ज्यूं मानसूनी की वर्षा से घर उनके ढह गये हों।
More creative works by यशवंत पंवार · अन्य रचनाएँ
Poetry
चाह
Volume 2
Issue 1
March 2026 pp. 81–82
Writer & Affiliation · लेखक परिचय
यशवंत पंवार
Corresponding writer
सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, राजकीय महाविद्यालय, चिन्यालीसौड़, उत्तरकाशी, उत्तराखंड, (भारत)
Published Work · प्रकाशित रचना
जीवन के सुहाने उपवन में,
प्रसून पल्लवित सबकी चाह।
लेकिन चाह के चाहत में,
फूलों के पराग में चाह।।
परिणय सूत्र में आकर के,
सिर्फ सबको खुशबू की चाह।
मिली सुगंध मीठी लीली की,
फिर बन जाती गुड़हल की चाह ।।
लीली तुझको भी भाती है,
लीली मुझको भी भाती है।
फिर किसके मन में आ बैठी है,
धवल रक्तिम चाह गुड़हल की ।।
प्रश्न बड़ा जटिल, कुटिल है,
उत्तर एक सा नहीं किसी का।
कोई कहे उपवन की चाह,
कोई कहे माली की चाह है।।
लेकिन बात यहीं नहीं रुकती,
एक गण उन लोगों का भी है।
जो कहे तेरी, मेरी ,परिवेश की,
बनी परम्परा की चाहत है ।।
दि्वज पांडित्य कर्मफल बताकर,
अनभिज्ञता उतराधिकार कहलाती ।
चाह के चाहत हेतु न जाने,
रोज़ कितनी लीली मुरझाती।।
सच पूछो तो, अरि लीली तुम्हारा,
लीली ही का पौधा है ।
गुड़हल की क्या हस्ती है जो,
तेरा कर सकता सौदा है।।
विद्वत्ता के इस रण में हम,
आज भी ख़ुदको परास्त पाते हैं।
चाह का पौधा जहां उगता है ,
उपवन वहीं उजाड़ते हैं।।।
लीली तुम जन्मदात्री हो,
त्रिभुवन भी यही गाता है।
फिर क्यों तेरे उद्भव पर,
जग हर्षित नहीं हो पाता है।।
अभिशाप तो नहीं शून्य का,
क्योंकि तुम विविध रूप रखती हैं।
या फिर गुड़हल के शासन को ,
तुम कुचल नहीं सकती हैं।
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