Poetry
Creative Writer · रचनाकार
प्रवीण भट्ट "यायावर"
"यायावर"
सहायक प्राध्यापक, विभाग प्रभारी, हिन्दी विभाग, रामचंद्र उनियाल राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, उत्तरकाशी, उत्तराखंड, (भारत)
पहाड़ हमेशा छले गए,
पहाड़ी सदा दले गए
आये कुछ सफेदपोश
झुनझुना लेकर विकास का
दिखाए सपने
खाई कसमें
किये गए लम्बे करार।।
करार में थी चौड़ी सड़कें
लम्बे पुल
जो उन नदियों के ऊपर थे
जो जीवन थी पहाड़ का
बनने लगी फिर लम्बी सुरंगें
बड़े बांध
जिन्होंने बांधा उन नदियों के किनारों को
जो जीवंत करती थी पहाड़ों को।।
फिर कुछ आवाजें उठी
वे चिल्लाते रहे
पहाड़ मर रहा है
वो बिखर रहा है
उसकी छाती में
दरारों का जाल दिख रहा है
उसे बचाओ उसे बचाओ।।
फिर कुछ लोग
दौड़कर आये
दौड़ना तो दिखावा था
वे उन उठती आवाजों को
कर गए अनसुना
चिल्लाने पर उनके वे
बन गए बहरे
उन्होंने लिखा फिर
कागजों पर
सब ठीक है, सब ठीक है।।
पहाड़ कराहता रहा
उसकी छाती खोदी जा चुकी थी
उसके कान बहरे हो गए
शोर से मशीनों के
उसकी धमनियों में
बहने वाली नदियां
कैद थी उन बांधों में
शरीर छलनी था बड़े विस्फोटों से।
आज पहाड़ दम तोड़ रहा है
फिर भी सब मौन हैं
उसकी मृत्यु पर
बस कुछ आवाजें हैं
जो उससे टकराकर
लौट रही है वापस
बस अब वही आवाजें हैं।
पहाड़ मर रहा है।
पहाड़ मर रहा है।
More creative works by प्रवीण भट्ट "यायावर" · अन्य रचनाएँ
Poetry
जिजीविषा
Volume 2
Issue 1
March 2026 pp. 80
Writer & Affiliation · लेखक परिचय
प्रवीण भट्ट "यायावर"
Corresponding writer
सहायक प्राध्यापक, विभाग प्रभारी, हिन्दी विभाग, रामचंद्र उनियाल राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, उत्तरकाशी, उत्तराखंड, (भारत)
Published Work · प्रकाशित रचना
जिजीविषाएं जीवित रखेंगी हमें,
हममें , हमारे आने वालों में,
विचार और सृजन से,
जब तक हम
नष्ट न हों
भौतिक रूप में.....
नष्ट होकर भी
अमर रहेंगी
हमारी जिजीविषा
हमारे विचारों में
वो हथियार बनेंगी
आने वालों के मस्तिष्कों का....
Continue Reading · आगे पढ़ें
Related Creative Works · संबंधित रचनाएँ
Poetry
चाह
यशवंत पंवार pp. 81–82Poetry
मानसून
यशवंत पंवार pp. 83Poetry