Non-Fiction
पेंडिंग मनुष्य : एक महागाथा
Volume 1 · Issue 1
September 2025 pp. 111–113
व्यंग
मनुष्य को यह भ्रांति है कि वह विकसित हो चुका है।
पर इतिहास कुछ और कहता है—वह सिर्फ़ अपनी पेंडिंग लिस्ट में उन्नति कर चुका है।
• कभी वह शिकार टालता था,
• फिर खेती टालने लगा,
• फिर विवाह टाला,
• और आजकल टैक्स।
मनुष्य बदल गया है—काम टालने के साधन बस अधिक परिष्कृत हो गए हैं।
1. महान मानवीय उपलब्धि: कुछ न करना
कहा जाता है कि जब मनुष्य ने पहिया बनाया, वह मानव सभ्यता का आरंभ था। पर असली सभ्यता तब शुरू हुई जब उसने पहली बार कहा:
“अरे, करने का है तो… कर लेंगे न यार, अभी क्या जल्दी है!”
• इसी वाक्य ने मनुष्य को देवताओं से अलग किया।
• देवता तुरंत काम करते हैं—इसलिए बोर हो जाते हैं।
• मनुष्य काम टालता है—इसलिए रोचक बना रहता है।
2. पेंडिंग लिस्ट: एक प्रजाति-विशेष ग्रंथ
हर आदमी के भीतर एक अदृश्य दफ्तरी कमरा है—"कार्य एवं विलंब विभाग"—जहाँ तीन अधिकारी बैठे हैं:
अधिकारी का नाम कार्य का विवरण
इच्छा अधिकारी रोज़ नए काम सुझाता है: "ध्यान करेंगे।" "दौड़ना शुरू करेंगे।" "50 किताबें पढ़ेंगे।"
बहाना प्रकोष्ठ कारण बताता है: "आज मौसम ठीक नहीं।" "अभी मन साफ़ नहीं।" "थोड़ा थकान है।" "नेटवर्क स्लो है।"
आध्यात्मिक सलाहकार हर अधूरे काम को अस्तित्ववादी अर्थ देता है: "जो अधूरा है वही वास्तविक है।" "पूर्णता तो भ्रम है।"
नोट: इस विभाग की एक भी बैठक कभी पूरी नहीं होती। क्योंकि “बैठक की कार्यवाही अगली बैठक तक टाल दी जाती है।”
3. दिन की संरचना: टालो, पछताओ, सो जाओ
• सुबह की शुरुआत: उस वादे से जो दो घंटे बाद ही टूटा हुआ मिलता है: “आज सब कुछ निपटा दूँगा।”
• पहला विलंब: फ़ीड में पहला ही वीडियो आता है: “5 आदतें जो आपकी जिंदगी बदल देंगी।” मनुष्य सोचता है—"इसे देख लेते हैं, फिर शुरू करेंगे।"
• परिणाम: वीडियो खत्म होते-होते जिंदगी नहीं बदलती, बस दिन के दो घंटे पेंडिंग हो जाते हैं।
• दोपहर तक: मनुष्य समझ जाता है—अब आधा दिन गए, तो पूरा दिन ही जाए… कल से ठीक रहेंगे।
• रात को: वह लिस्ट देखता है—और सबसे बड़ा संस्कार निभाता है: पोस्टपोन (Postpone)।
4. घर में फैली हुई पेंडिंग ऊर्जा
घर में जो कोना साफ़ नहीं है, वह सिर्फ़ धूल का अड्डा नहीं होता—वह मनुष्य की इच्छाओं का कब्रिस्तान होता है:
• किताबें जो खरीदी गयीं पर अब तक खुली नहीं।
• जूते जो ‘दौड़’ के लिए थे पर सिर्फ़ सब्ज़ी लेने गए।
• डायरी जिसमें तीन दिन लिखा गया और बाकी 362 दिन खाली रहे।
ये सब पेंडिंग ऊर्जा की सूक्ष्म प्रतिमाएँ हैं। कुछ लोग तो अपने सपने भी ऐसे रखते हैं जैसे बर्तन: उलटकर अलमारी में।
5. विज्ञान और पेंडिंग मनुष्य
पैंडिंग लिस्ट के शायद सबसे गंभीर वैज्ञानिक प्रभाव हैं:
• अगर आइंस्टाइन हर चीज़ समय पर करता, तो शायद वह $E=mc^2$ न लिख पाता; टालते-टालते ही उसे ब्रह्माण्ड की विचित्रता दिखाई दी।
• न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण इसलिए खोजा क्योंकि वह पेड़ के नीचे कुछ नहीं कर रहा था।
संभावित निष्कर्ष: आलस मानव सभ्यता का असली शोध केंद्र है।
6. समाजशास्त्र: दो प्रकार के लोग
दुनिया में सिर्फ़ दो लोग हैं:
(अ) पेंडिंग करने वाले:
जो कहते हैं — “अभी नहीं, बाद में कर लेंगे।”
(ब) पेंडिंग करवाने वाले:
जो कहते हैं — “ये अभी कर दो।”
इन्हीं दो वर्गों के संघर्ष से मानव इतिहास आगे बढ़ता है। सरकारें बदलती हैं, योजनाएँ बनती हैं, नागरिक टालते हैं। सभ्यता चलती है।
7. पेंडिंग और अध्यात्म का गूढ़ रहस्य
• कुछ योगी मानते हैं कि अधूरा काम ही मनुष्य को जीवन से बाँधे रखता है।
• लोग ध्यान के लिए समय निकालते-निकालते बुढ़ापा निकाल देते हैं।
• ध्यान वहीं पहुँचता है, पर पहुँच तब पाता है जब मनुष्य जीवन की बाकी सारी जरूरी चीज़ें पेंडिंग कर चुका होता है।
8. काल का महापुराण: आज और कल
• आज (Today): दोहरा स्वभाव रखता है—काम का भी, बहाने का भी।
• कल (Tomorrow): एक आध्यात्मिक प्रदेश है—जहाँ सब कुछ बेहतर होने वाला है—और जहाँ कोई कभी जाता नहीं।
कल वह मंदिर है जहाँ मनुष्य अपने सपने चढ़ा देता है और लौट आता है बिना प्रसाद लिए।
9. निष्कर्ष (जो आज लिखा गया, कल भी लिखा जा सकता था)
आधुनिक मनुष्य कहीं पहुंचता नहीं, बस अपने पेंडिंग ब्रह्माण्ड में सर्पिल गति से घूमता रहता है।
और रात्रि के अंतिम क्षणों में, जब वह सोने ही वाला होता है, एक धीमी-सी आवाज़ आती है:
“स्टिलनेस अपना नाम फिर नहीं सीख पाई।”
और वह मुस्कुराकर, अगले दिन की शुरुआत के लिए, सब कुछ एक बार फिर पेंडिंग कर देता है।